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mahabharat 14.111.d45: इसके बाद अष्टाक्षर मंत्र का जाप करते हुए ब्राह्मण देवता की परिक्रमा करें। ऐसा करने से ब्राह्मण प्रसन्न होते हैं और मैं प्रणाम करने वाले के पापों का नाश करता हूँ।   |   mahabharat अध्याय 14.111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त  »  श्लोक d45
 
 
श्लोक  14.111.d45 
प्रदक्षिणं च य: कुर्यात् पुनरष्टाक्षरेण तु।
तेन तुष्टेन विप्रेण तत्पापं क्षपयाम्यहम्॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद अष्टाक्षर मंत्र का जाप करते हुए ब्राह्मण देवता की परिक्रमा करें। ऐसा करने से ब्राह्मण प्रसन्न होते हैं और मैं प्रणाम करने वाले के पापों का नाश करता हूँ।
 
After this, while chanting the Ashtakshar Mantra, circumambulate the Brahmin deity. By doing this, the Brahmins are pleased and I destroy the sins of the person doing the bowing.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)