श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त  »  श्लोक d42
 
 
श्लोक  14.111.d42 
युधिष्ठिर उवाच
भगवन् सर्वपापघ्नं प्रायश्चित्तमदुष्करम्।
त्वद्भक्तस्य सुरश्रेष्ठ मम त्वं वक्तुमर्हसि॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, "हे देवराज! मैं आपका भक्त हूँ। अब कृपया मुझे कोई ऐसा प्रायश्चित बताइए जो करने में सरल हो और समस्त पापों का नाश करने वाला हो।"
 
Yudhishthira said, "O Lord, the greatest of gods! I am your devotee. Now please tell me some atonement which is easy to do and destroys all sins."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)