Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 14.111.d33: इस संसार में पुण्य कर्मों के अनुष्ठान से शुद्ध हुए मनुष्य के हृदय में सभी तीर्थ निवास करते हैं, इसलिए उसे तीर्थ स्वरूप कहा गया है।   |   mahabharat अध्याय 14.111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त  »  श्लोक d33
 
 
श्लोक  14.111.d33 
कर्मणापि विशुद्धस्य पुरुषस्येह भारत।
हृदये सर्वतीर्थानि तीर्थभूत: स उच्यते॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में पुण्य कर्मों के अनुष्ठान से शुद्ध हुए मनुष्य के हृदय में सभी तीर्थ निवास करते हैं, इसलिए उसे तीर्थ स्वरूप कहा गया है।
 
India In this world, all the places of pilgrimage reside in the heart of a man who has been purified by the rituals of virtuous deeds, hence he is called the embodiment of pilgrimage.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)