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mahabharat 14.111.d31: हे कुन्तीपुत्र! इन सबका मूल 'धर्म' है - ऐसा जानकर, इसी पर मन लगाओ और तीर्थों में जाओ; क्योंकि धर्म करने से धर्म की वृद्धि होती है।   |   mahabharat अध्याय 14.111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त  »  श्लोक d31
 
 
श्लोक  14.111.d31 
मूलं धर्मं तु विज्ञाय मनस्तत्रावधार्यताम्।
गच्छ तीर्थानि कौन्तेय धर्मो धर्मेण वर्धते॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! इन सबका मूल 'धर्म' है - ऐसा जानकर, इसी पर मन लगाओ और तीर्थों में जाओ; क्योंकि धर्म करने से धर्म की वृद्धि होती है।
 
Kunti's son! The root of all these is 'Dharma' - knowing this, concentrate on this and go to the holy places; because by doing Dharma, Dharma increases.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)