श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त  »  श्लोक d25
 
 
श्लोक  14.111.d25 
श्रीभगवानुवाच
अहमश्वत्थरूपेण पालयामि जगत‍्त्रयम्।
अश्वत्थो न स्थितो यत्र नाहं तत्र प्रतिष्ठित:॥
 
 
अनुवाद
श्री भगवान बोले- राजन! मैं पीपल के वृक्ष का रूप धारण करके तीनों लोकों का पालन-पोषण करता हूँ। जहाँ पीपल का वृक्ष नहीं होता, वहाँ मैं निवास नहीं करता।
 
Sri Bhagavan said- King! I take the form of the Peepal tree and take care of all the three worlds. Where there is no Peepal tree, I do not reside there.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)