श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त  »  श्लोक d22-d23
 
 
श्लोक  14.111.d22-d23 
श्रीभगवानुवाच
द्वादश्यां विषुवे चैव चन्द्रसूर्यग्रहे तथा।
अयने श्रवणे चैव व्यतीपाते तथैव च॥
अश्वत्थदर्शने चैव तथा मद्दर्शनेऽपि च।
जप्या तु मम गायत्री चाथवाष्टाक्षरं नृप।
अर्जितं दुष्कृतं तस्य नाशयेन्नात्र संशय:॥
 
 
अनुवाद
श्री भगवान बोले - राजन! मेरे गायत्रिक या अष्टाक्षर मन्त्र (ॐ नमो नारायणाय) का जप द्वादशी तिथि को, विषुव के समय, चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के समय, उत्तरायण और दक्षिणायन के प्रारम्भ में, श्रवण नक्षत्र में तथा व्यतिपात योग में पीपल या मेरा दर्शन करते समय करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य के पूर्वजन्म के पाप निस्संदेह नष्ट हो जाते हैं।
 
Shri Bhagavan said – King! My Gayatrika or Ashtakshar Mantra (Om Namo Narayanay) should be chanted on Dwadashi Tithi, during equinox, at the time of lunar eclipse and solar eclipse, on the beginning of Uttarayan and Dakshinayan, during Shravan Nakshatra and during Vyatipat Yoga, on seeing Peepalka or me. By doing this, man's past sins are undoubtedly destroyed.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)