श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त  »  श्लोक d13-d14
 
 
श्लोक  14.111.d13-d14 
चन्द्रसूर्यग्रहे व्योम्नि मम वा शङ्करस्य वा।
गायत्रीं मामिकां वापि जपेद् य: शङ्करस्य वा॥
शङ्खतूर्यस्वनैश्चैव कांस्यघण्टास्वनैरपि।
कारयेत् तु ध्वनिं भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु॥
 
 
अनुवाद
जब आकाश में चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहण हो, तब जो मेरी या भगवान शंकर की पूजा करके मेरी गायत्री या शंकर की गायत्री का जप करता है तथा शंख, तुरही, झांझ और घंटा बजाकर भक्तिपूर्वक उसकी ध्वनि करता है, उसके पुण्य फल का वर्णन सुनो।
 
When there is a lunar eclipse or a solar eclipse in the sky, listen to the description of the virtuous results of the one who worships me or Lord Shankar and chants my Gayatri or Shankar's Gayatri and makes its sound with devotion by blowing conch, trumpet, cymbal and bell.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)