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mahabharat 14.110.d9: उसके दस जन्मों के पाप, चाहे वे जाने-अनजाने में किये गये हों, तुरन्त नष्ट हो जाते हैं - इस विषय में अन्यथा सोचने की आवश्यकता नहीं है।   |   mahabharat अध्याय 14.110: सर्वहितकारी धर्मका वर्णन, द्वादशी-व्रतका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके द्वारा भगवान‍्की स्तुति   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.110.d9 
दशजन्मकृतं पापं ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा।
तद् विनश्यति तस्याशु नात्र कार्या विचारणा॥
 
 
अनुवाद
उसके दस जन्मों के पाप, चाहे वे जाने-अनजाने में किये गये हों, तुरन्त नष्ट हो जाते हैं - इस विषय में अन्यथा सोचने की आवश्यकता नहीं है।
 
The sins of his ten births, whether committed knowingly or unknowingly, are destroyed instantly - there is no need to think otherwise in this matter.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)