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mahabharat 14.110.d45: नरोत्तम! भगवान श्रीकृष्ण पुनः उसकी भक्ति से विनीत हो गए और वाणी द्वारा उसका निवारण करके धर्मपुत्र युधिष्ठिर से इस प्रकार कहने लगे।   |   mahabharat अध्याय 14.110: सर्वहितकारी धर्मका वर्णन, द्वादशी-व्रतका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके द्वारा भगवान‍्की स्तुति   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.110.d45 
निवार्य च पुनर्वाचा भक्तिनम्रं युधिष्ठिरम्।
वक्तुमेव नरश्रेष्ठ धर्मपुत्रं प्रचक्रमे॥
 
 
अनुवाद
नरोत्तम! भगवान श्रीकृष्ण पुनः उसकी भक्ति से विनीत हो गए और वाणी द्वारा उसका निवारण करके धर्मपुत्र युधिष्ठिर से इस प्रकार कहने लगे।
 
Narottam! Lord Shri Krishna again became humble by his devotion by redressing him through speech and started saying this to Dharma's son Yudhishthira.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)