Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 14.110.d44: वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन! जब धर्मराज युधिष्ठिर भक्तिमय वाणी से इस प्रकार भगवान की स्तुति करने लगे, तब श्रीकृष्ण ने प्रसन्नतापूर्वक धर्मराज का हाथ पकड़कर उन्हें रोक दिया।   |   mahabharat अध्याय 14.110: सर्वहितकारी धर्मका वर्णन, द्वादशी-व्रतका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके द्वारा भगवान‍्की स्तुति   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 110: सर्वहितकारी धर्मका वर्णन, द्वादशी-व्रतका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके द्वारा भगवान‍्की स्तुति  »  श्लोक d44
 
 
श्लोक  14.110.d44 
वैशम्पायन उवाच
भक्तिगद्‍गदया वाचा स्तुवत्येवं युधिष्ठिरे।
गृहीत्वा केशवो हस्ते प्रीतात्मा तं न्यवारयत्॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन! जब धर्मराज युधिष्ठिर भक्तिमय वाणी से इस प्रकार भगवान की स्तुति करने लगे, तब श्रीकृष्ण ने प्रसन्नतापूर्वक धर्मराज का हाथ पकड़कर उन्हें रोक दिया।
 
Vaishampayanji says – King! When Dharmaraja Yudhishthir started praising God in this way with devotional speech, then Shri Krishna happily held Dharmaraja's hand and stopped him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)