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mahabharat 14.110.d33: जो द्वादशी तिथि को मुझे चंदन, फूल, फल, जल, पत्ते या मूल अर्पित करता है, उसके समान मुझे कोई भी भक्त प्रिय नहीं है।   |   mahabharat अध्याय 14.110: सर्वहितकारी धर्मका वर्णन, द्वादशी-व्रतका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके द्वारा भगवान‍्की स्तुति   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.110.d33 
गन्धं पुष्पं फलं तोयं पत्रं वा मूलमेव वा।
द्वादश्यां मम यो दद्यात् तत्समो नास्ति मत्प्रिय:॥
 
 
अनुवाद
जो द्वादशी तिथि को मुझे चंदन, फूल, फल, जल, पत्ते या मूल अर्पित करता है, उसके समान मुझे कोई भी भक्त प्रिय नहीं है।
 
There is no devotee as dear to me as the one who offers me sandalwood, flowers, fruits, water, leaves or roots on the Dwadashi tithi.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)