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mahabharat 14.110.d31: इस प्रकार जो मेरा भक्त मेरी पूजा में तत्पर रहता है और बारह वर्षों तक बिना किसी विघ्न के मेरी पूजा करता रहता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।   |   mahabharat अध्याय 14.110: सर्वहितकारी धर्मका वर्णन, द्वादशी-व्रतका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके द्वारा भगवान‍्की स्तुति   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.110.d31 
एवं द्वादशवर्षं यो मद्भक्तो मत्परायण:।
अविघ्नमर्चयानस्तु मम सायुज्यमाप्नुयात्॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार जो मेरा भक्त मेरी पूजा में तत्पर रहता है और बारह वर्षों तक बिना किसी विघ्न के मेरी पूजा करता रहता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।
 
In this manner, the devotee of mine who is devoted to my worship and continues to worship me for twelve years without any hindrance, attains my form.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)