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mahabharat 14.110.d2: भगवान श्री ने कहा - युधिष्ठिर! सुनो, मैं उस धर्म का वर्णन कर रहा हूँ जो दरिद्रों को भी स्वर्ग और सुख प्रदान करता है तथा समस्त पापों का नाश करता है।   |   mahabharat अध्याय 14.110: सर्वहितकारी धर्मका वर्णन, द्वादशी-व्रतका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके द्वारा भगवान‍्की स्तुति   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.110.d2 
श्रीभगवानुवाच
यद् दरिद्रजनस्यापि स्वर्ग्यं सुखकरं भवेत्।
सर्वपापप्रशमनं तच्छृणुष्व युधिष्ठिर॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्री ने कहा - युधिष्ठिर! सुनो, मैं उस धर्म का वर्णन कर रहा हूँ जो दरिद्रों को भी स्वर्ग और सुख प्रदान करता है तथा समस्त पापों का नाश करता है।
 
Lord Shri said – Yudhishthir! Listen, I am describing the religion which provides heaven and happiness even to poor people and destroys all sins.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)