श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 109: चान्द्रायण-व्रतकी विधि, प्रायश्चित्तरूपमें उसके करनेका विधान तथा महिमाका वर्णन  »  श्लोक d28
 
 
श्लोक  14.109.d28 
स्थाने न दिवसं तिष्ठेद् रात्रौ वीरासनं व्रजेत्।
भवेत् स्थण्डिलशायी वाप्यथवा वृक्षमूलिक:॥
 
 
अनुवाद
दिन में एक स्थान पर खड़े न रहें, रात्रि में वीरासन में बैठें या किसी वेदी पर या वृक्ष की जड़ पर सोएं।
 
Do not stand at one place during the day; at night sit in Veerasan or sleep on an altar or on the root of a tree.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)