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mahabharat 14.109.d16-d17: अथवा सोने, चाँदी, ताँबे, मिट्टी या गूलर की लकड़ी का पात्र बनाकर, अथवा यज्ञ के वृक्षों के हरे पत्तों का कटोरा बनाकर, उसे हाथ में लेकर ऊपर से ढक दो। फिर ध्यानपूर्वक भिक्षा के लिए जाओ।   |   mahabharat अध्याय 14.109: चान्द्रायण-व्रतकी विधि, प्रायश्चित्तरूपमें उसके करनेका विधान तथा महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.109.d16-d17 
पात्रं तु सुसमादाय सौवर्णं राजतं तु वा।
ताम्रं वा मृण्मयं वापि औदुम्बरमथापि वा॥
वृक्षाणां यज्ञियानां तु पर्णैरार्द्रैरकुत्सितै:।
पुटकेन तु गुप्तेन चरेद् भैक्षं समाहित:॥
 
 
अनुवाद
अथवा सोने, चाँदी, ताँबे, मिट्टी या गूलर की लकड़ी का पात्र बनाकर, अथवा यज्ञ के वृक्षों के हरे पत्तों का कटोरा बनाकर, उसे हाथ में लेकर ऊपर से ढक दो। फिर ध्यानपूर्वक भिक्षा के लिए जाओ।
 
Or make a vessel of gold, silver, copper, clay or sycamore wood or a bowl of green leaves of trees used for sacrifices and take it in your hand and cover it from above. Then carefully go for alms.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)