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mahabharat 14.109.d14: अथवा वीरघ्न, ऋषभ, अघमर्षण, गायत्री अथवा मुझसे संबंधित वैष्णवों को गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए। यह जप सौ बार, एक सौ आठ बार अथवा एक हजार बार करना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 14.109: चान्द्रायण-व्रतकी विधि, प्रायश्चित्तरूपमें उसके करनेका विधान तथा महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.109.d14 
वीरघ्नमृषभं वापि तथा चाप्यघमर्षणम्।
गायत्रीं मम देवीं वा सावित्रीं वा जपेत् तत:।
शतं वाष्टशतं वापि सहस्रमथवा परम्॥
 
 
अनुवाद
अथवा वीरघ्न, ऋषभ, अघमर्षण, गायत्री अथवा मुझसे संबंधित वैष्णवों को गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए। यह जप सौ बार, एक सौ आठ बार अथवा एक हजार बार करना चाहिए।
 
Or the Vaishnavas related to Veeraghna, Rishabha, Aghamarshan, Gayatri or me should chant the Gayatri Mantra. This chanting should be done a hundred times or one hundred and eight times or one thousand times.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)