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mahabharat 14.107.d6: जो व्यक्ति उचित रीति से तप करने में असमर्थ है, वह विद्वानों के वचनों से तथा दान देकर पवित्र हो सकता है।   |   mahabharat अध्याय 14.107: आपद्धर्म, श्रेष्ठ और निन्द्य ब्राह्मण, श्राद्धका उत्तम काल और मानव-धर्म-सारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.107.d6 
अशक्तो विधिवत् कर्तुं प्रायश्चित्तानि यो नर:।
विदुुषां वचनेनापि दानेनापि विशुद्धॺति॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति उचित रीति से तप करने में असमर्थ है, वह विद्वानों के वचनों से तथा दान देकर पवित्र हो सकता है।
 
A person who is unable to do penance in a proper manner can become pure by the words of learned people and by giving charity.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)