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mahabharat 14.107.d53: आपको अपने गुरु के दाहिने पैर को अपने दाहिने हाथ से और उनके बाएँ पैर को अपने बाएँ हाथ से पकड़कर उन्हें प्रणाम करना चाहिए। आपको अपने गुरु को कभी भी केवल एक हाथ से प्रणाम नहीं करना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 14.107: आपद्धर्म, श्रेष्ठ और निन्द्य ब्राह्मण, श्राद्धका उत्तम काल और मानव-धर्म-सारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.107.d53 
सव्येन सव्यं संगृह्य दक्षिणेन तु दक्षिणम्।
न कुर्यादेकहस्तेन गुरो: पादाभिवादनम्॥
 
 
अनुवाद
आपको अपने गुरु के दाहिने पैर को अपने दाहिने हाथ से और उनके बाएँ पैर को अपने बाएँ हाथ से पकड़कर उन्हें प्रणाम करना चाहिए। आपको अपने गुरु को कभी भी केवल एक हाथ से प्रणाम नहीं करना चाहिए।
 
You should bow down to your Guru by holding his right foot with your right hand and his left foot with your left hand. You should never bow down to your Guru with just one hand.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)