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mahabharat 14.107.d5: जल, मूल, घी, दूध, नैवेद्य, ब्राह्मण की इच्छा पूरी करना, गुरु की आज्ञा का पालन करना तथा औषधि सेवन करना – इन आठों के सेवन से व्रत भंग नहीं होता।   |   mahabharat अध्याय 14.107: आपद्धर्म, श्रेष्ठ और निन्द्य ब्राह्मण, श्राद्धका उत्तम काल और मानव-धर्म-सारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.107.d5 
अष्टौ तान्यव्रतघ्नानि आपो मूलं घृतं पय:।
हविर्ब्राह्मणकाम्या च गुरोर्वचनमौषधम्॥
 
 
अनुवाद
जल, मूल, घी, दूध, नैवेद्य, ब्राह्मण की इच्छा पूरी करना, गुरु की आज्ञा का पालन करना तथा औषधि सेवन करना – इन आठों के सेवन से व्रत भंग नहीं होता।
 
Water, roots, ghee, milk, offerings, fulfilling the wish of a Brahmin, obeying the orders of the Guru and taking medicine – the fast is not broken by consuming these eight.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)