श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 107: आपद्धर्म, श्रेष्ठ और निन्द्य ब्राह्मण, श्राद्धका उत्तम काल और मानव-धर्म-सारका वर्णन  »  श्लोक d49-d50
 
 
श्लोक  14.107.d49-d50 
गर्भहोमैर्जातकर्मनामचौलोपनायनै:।
स्वाध्यायैस्तद् व्रतैश्चैव विवाहस्नातकव्रतै:॥
महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनु:॥
 
 
अनुवाद
गर्भाधान संस्कार में किये जाने वाले हवन तथा जातकर्म, नामकरण, चूड़ाकरण, यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन, वेदों में लिखे व्रतों का पालन, दीक्षा, विवाह, पंच महायज्ञों के अनुष्ठान आदि के माध्यम से इस शरीर को परब्रह्म की प्राप्ति के योग्य बनाया जाता है।
 
This body is made capable of attaining the Supreme Brahman through the Havan performed during the conception ceremony and through Jaatkarma, Namkaran, Chudakaran, Yajnopavit, Veda study, observance of the vows written in the Vedas, fasts to be observed for graduation, marriage, rituals of Panch Mahayagyas and other yagyas.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)