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mahabharat 14.107.d33: श्री भगवान बोले - महाप्रज्ञ! सृष्टि के आदि में मनुजी ने जिस धर्म का सार बताया है, वह पुराणों के अनुकूल और वेदों द्वारा समर्थित है। सुनो, मैं उसी मनु-प्रतिपादित धर्म का वर्णन कर रहा हूँ।   |   mahabharat अध्याय 14.107: आपद्धर्म, श्रेष्ठ और निन्द्य ब्राह्मण, श्राद्धका उत्तम काल और मानव-धर्म-सारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.107.d33 
श्रीभगवानुवाच
धर्मसारं महाप्राज्ञ मनुना प्रोक्तमादित:।
प्रवक्ष्यामि मनुप्रोक्तं पौराणं श्रुतिसंहितम्॥
 
 
अनुवाद
श्री भगवान बोले - महाप्रज्ञ! सृष्टि के आदि में मनुजी ने जिस धर्म का सार बताया है, वह पुराणों के अनुकूल और वेदों द्वारा समर्थित है। सुनो, मैं उसी मनु-प्रतिपादित धर्म का वर्णन कर रहा हूँ।
 
Shri Bhagwan said – Mahapragya! The essence of religion that Manuji has described in the beginning of creation is in accordance with the Puranas and is supported by the Vedas. Listen, I am describing the same Manu-proclaimed religion.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)