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mahabharat 14.107.d25: हे पाण्डुपुत्र! ग्रहण, विषुव, संक्रांति के अंत में, पितरों के श्राद्ध आदि के समय, मघा नक्षत्र में, पुत्र जन्म पर तथा गया में पिण्डदान करते समय दिया गया दान एक हजार स्वर्ण मुद्राओं के दान के बराबर होता है।   |   mahabharat अध्याय 14.107: आपद्धर्म, श्रेष्ठ और निन्द्य ब्राह्मण, श्राद्धका उत्तम काल और मानव-धर्म-सारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.107.d25 
ग्रहोपरागे विषुवेऽयनान्ते
पित्र्ये मघासु स्वसुते च जाते।
गयेषु पिण्डेषु च पाण्डुपुत्र
दत्तं भवेन्निष्कसहस्रतुल्यम्॥
 
 
अनुवाद
हे पाण्डुपुत्र! ग्रहण, विषुव, संक्रांति के अंत में, पितरों के श्राद्ध आदि के समय, मघा नक्षत्र में, पुत्र जन्म पर तथा गया में पिण्डदान करते समय दिया गया दान एक हजार स्वर्ण मुद्राओं के दान के बराबर होता है।
 
Son of Pandu! The donation given at the time of eclipse, equinox, at the end of the solstice, during the rituals for ancestors (shraddha etc.), during the Magha Nakshatra, on the birth of a son and while performing Pinddaan at Gaya, is equivalent to donating one thousand gold coins.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)