Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 14.107.d14-d15: हे मनुष्यों के स्वामी! मैं नहीं जानता कि उस ब्राह्मण की कैसी गति है, जिसका शरीर मरने वालों का अन्न खाकर मोटा हो गया है, जो शूद्र का अन्न खाता है और जो शूद्र के अन्न के रस से पुष्ट हुआ है; क्योंकि प्रतिदिन अध्ययन, जप और हवन करने पर भी वह उत्तम गति को प्राप्त नहीं होता। | mahabharat अध्याय 14.107: आपद्धर्म, श्रेष्ठ और निन्द्य ब्राह्मण, श्राद्धका उत्तम काल और मानव-धर्म-सारका वर्णन । mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
मृतसूतकपुष्टाङ्गो यश्च शूद्रान्नभुग् द्विज:।
अहं चापि न जानामि गतिं तस्य नराधिप॥
शूद्रान्नरसपुष्टाङ्गोऽप्यधीयानो हि नित्यश:।
जपतो जुह्वतो वापि गतिरूर्ध्वं न विद्यते॥
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! मैं नहीं जानता कि उस ब्राह्मण की कैसी गति है, जिसका शरीर मरने वालों का अन्न खाकर मोटा हो गया है, जो शूद्र का अन्न खाता है और जो शूद्र के अन्न के रस से पुष्ट हुआ है; क्योंकि प्रतिदिन अध्ययन, जप और हवन करने पर भी वह उत्तम गति को प्राप्त नहीं होता।
O lord of men! I do not know what kind of a Brahmin's progress is, whose body has become fat by eating the food of those who are dying, who eats the food of a shudra and who has become nourished by the juice of the food of a shudra; because even after daily study, chanting and performing havans, he does not achieve the best.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥