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mahabharat 14.106.d14: जो व्यक्ति अपना जूठा भोजन स्वयं खाता है तथा एक बार भोजन करने के बाद बचे हुए अन्न को खाता है, उसे चान्द्रायण, कृच्छ या प्रजापत्य व्रत का पालन करना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 14.106: भोजनकी विधि, गौओंको घास डालनेका विधान और तिलका माहात्म्य तथा ब्राह्मणके लिये तिल और गन्ना पेरनेका निषेध   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.106.d14 
स्वमुच्छिष्टं तु यो भुङ्‍क्ते यो भुङ्‍क्ते मुक्तभोजनम्॥
चान्द्रायणं चरेत् कृच्छ्रं प्राजापत्यमथापि वा।
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति अपना जूठा भोजन स्वयं खाता है तथा एक बार भोजन करने के बाद बचे हुए अन्न को खाता है, उसे चान्द्रायण, कृच्छ या प्रजापत्य व्रत का पालन करना चाहिए।
 
He who eats his own leftovers and eats the food left over after eating once, should observe Chandrayana, Krichchha or Prajapatya-vrata.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)