श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 106: भोजनकी विधि, गौओंको घास डालनेका विधान और तिलका माहात्म्य तथा ब्राह्मणके लिये तिल और गन्ना पेरनेका निषेध  » 
 
 
अध्याय 106: भोजनकी विधि, गौओंको घास डालनेका विधान और तिलका माहात्म्य तथा ब्राह्मणके लिये तिल और गन्ना पेरनेका निषेध
 
श्लोक d1:  युधिष्ठिर बोले- हे देवराज मधुसूदन! अन्नदान का फल सुनकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ। अब कृपया मुझे भोजन करने की विधि बताइए।
 
श्लोक d2-d3:  श्री भगवान बोले- पाण्डुनन्दन! दोनों वर्णों के आहार-विषयक नियम सुनो। श्रेष्ठ द्विज को उचित है कि वह स्नान करके पवित्र हो जाए और अग्निहोत्र करके शुद्ध एवं एकान्त स्थान में बैठकर ब्राह्मण हो तो चौकोर, क्षत्रिय हो तो गोलाकार तथा वैश्य हो तो अर्धचन्द्राकार वृत्त बनाए।
 
श्लोक d4:  इसके बाद अपने पैर धो लें और उसी स्थान पर बिछे स्वच्छ आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बैठ जाएं और दोनों पैरों से या एक पैर से जमीन को स्पर्श करें।
 
श्लोक d5:  ब्राह्मण को केवल एक वस्त्र पहनकर या पूरे शरीर को कपड़े से ढककर भोजन नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार टूटे हुए बर्तन या उलटी हुई थाली में भोजन करना भी वर्जित है।
 
श्लोक d6:  भोजन करते समय व्यक्ति को चाहिए कि वह पहले प्रसन्न मन से भोजन को नमस्कार करे, भोजन के अतिरिक्त अन्यत्र न देखे तथा भोजन करते समय भोजन की निन्दा न करे।
 
श्लोक d7:  जिस भोजन की निंदा की जाती है, उसे राक्षस खा जाते हैं। भोजन शुरू करने से पहले हाथ में जल लेकर भोजन की परिक्रमा करें।
 
श्लोक d8:  फिर मंत्र पढ़कर पांचों आत्माओं को अलग-अलग भोजन कराएं।
 
श्लोक d9:  राजन! प्राण त्यागते समय स्थिर और सावधान रहो तथा इस प्रकार प्राण त्यागो कि जीभ को स्वाद का भान ही न हो।
 
श्लोक d10:  पाण्डुनन्दन! जो मनुष्य अन्न, अभक्ष्य और पाँच प्राणों का सार जानकर प्राणाग्निहोत्र करता है, वह पाँच वायुओं का त्याग कर देता है।
 
श्लोक d11:  इसके विपरीत, मूर्ख ब्राह्मण जो भोजन करता है, वह अपने भोजन से केवल राक्षसों, भूतों और शैतानों को ही तृप्त करता है।
 
श्लोक d12:  प्राण त्यागने के बाद, भोजन का एक निवाला, जो मुँह में आ सके, उठाकर खाना चाहिए। जो निवाला इतना बड़ा हो कि मुँह में न आ सके और एक बार में न खाया जा सके, उसे बचा हुआ निवाला कहते हैं।
 
श्लोक d13:  जो भोजन मुख से रह जाए और मुख से बाहर निकल जाए, उसे अभक्ष्य समझना चाहिए और उसे खाकर चान्द्रायण व्रत का पालन करना चाहिए।
 
श्लोक d14:  जो व्यक्ति अपना जूठा भोजन स्वयं खाता है तथा एक बार भोजन करने के बाद बचे हुए अन्न को खाता है, उसे चान्द्रायण, कृच्छ या प्रजापत्य व्रत का पालन करना चाहिए।
 
श्लोक d15:  जो पापी स्त्री के बर्तन में भोजन करता है, स्त्री का जूठा खाता है तथा स्त्री के साथ उसी बर्तन में भोजन करता है, वह मदिरा पीने के समान है। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए बुद्धिमान ऋषियों ने कोई प्रायश्चित नहीं देखा है।
 
श्लोक d16:  यदि भोजन करते समय उस पर पानी की एक बूंद गिर जाए तो वह खाने योग्य नहीं रहता। उसे खाने वाले को चान्द्रायण व्रत का पालन करना चाहिए।
 
श्लोक d17:  पाण्डुनन्दन! इसी प्रकार पीकर बचा हुआ जल भी पुनः पीने योग्य नहीं रहता। यदि कोई ब्राह्मण मोहवश उसे पी ले, तो उसे चान्द्रायण व्रत करना चाहिए।
 
श्लोक d18:  ब्राह्मण के लिए यह उचित है कि वह चुपचाप, बिना पृथ्वी या दिशाओं की ओर देखे, अपना भोजन करे तथा अपना बचा हुआ भोजन किसी को न दे।
 
श्लोक d19:  कभी भी बहुत ज़्यादा या बहुत कम न खाएँ। हर दिन उतना ही खाना खाएँ, जिससे आपको कोई परेशानी न हो।
 
श्लोक d20:  जिस भोजन में बाल या कीड़े हों तथा जिसे मुँह से फूँककर ठंडा किया गया हो, उसे अभक्ष्य समझना चाहिए। ऐसा भोजन करने के बाद चान्द्रायण व्रत का पालन करना चाहिए।
 
श्लोक d21:  जो भोजन भोजन-स्थान से हटकर पुनः छू लिया गया हो, पैर से छू लिया गया हो अथवा लांघा गया हो, वह राक्षसों के लिए उपयुक्त भोजन है; ऐसा समझकर उसे त्याग देना चाहिए।
 
श्लोक d22:  यदि भोजन करने वाला ब्राह्मण बिना कुल्ला किए अपने भोजन-स्थान से उठ जाए, तो उसे तुरन्त स्नान करना चाहिए, अन्यथा वह अशुद्ध रहता है।
 
श्लोक d23:  युधिष्ठिर ने पूछा, "हे प्रभु! कृपया मुझे गायों को मुट्ठी भर घास देने का नियम, तिल का महत्व और गन्ने से चंद्रमा की उत्पत्ति के बारे में बताएं।"
 
श्लोक d24:  श्री भगवान बोले - राजन! बैलों को जगत का पिता और गौओं को जगत की माता मानना ​​चाहिए, इनकी पूजा करने से सभी पितर और देवता पूजित हो जाते हैं।
 
श्लोक d25:  गायों से बेहतर कौन हो सकता है, जिनके गोबर से सभा भवन, तालाब, घर और यहां तक ​​कि मंदिर भी पवित्र हो जाते हैं?
 
श्लोक d26:  जो व्यक्ति एक वर्ष तक प्रतिदिन अपना भोजन करने से पहले दूसरे की गाय को मुट्ठी भर घास खिलाता है, उसे हर बार गाय की सेवा करने का लाभ मिलता है।
 
श्लोक d27:  गौमाता के सामने घास रखकर यह कहना चाहिए - 'संसार की सभी गायें मेरी माताएँ हैं और सभी बैल मेरे पिता हैं। गौमाता! मैंने यह मुट्ठी भर घास आपकी सेवा में अर्पित की है, कृपया इसे स्वीकार करें।'
 
श्लोक d28:  इस मंत्र का जाप करने या गायत्री जप करने के बाद एकाग्र मन से घास को अभिमंत्रित करके गाय को खिला दें। ऐसा करने से जो पुण्य फल मिलता है, उसे सुनिए।
 
श्लोक d29:  उस मनुष्य द्वारा जाने-अनजाने में किए गए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे कभी बुरे स्वप्न नहीं आते।
 
श्लोक d30:  तिल अत्यंत पवित्र और पापों का नाश करने वाले होते हैं। इनकी उत्पत्ति भगवान नारायण से हुई है। इसीलिए श्राद्ध में तिलों की अत्यधिक महिमा है और तिलों का दान सर्वश्रेष्ठ दान माना गया है।
 
श्लोक d31:  तिल का दान करें, तिल खाएं, तिल का लेप लगाएं और सुबह स्नान करें। हमेशा 'तिल-तिल' शब्द बोलें क्योंकि तिल सभी पापों का नाश करते हैं।
 
श्लोक d32:  राजा! ब्राह्मण को तिल पीसने वाली मशीन में तिल डालकर उससे तेल नहीं निकालना चाहिए। जो व्यक्ति आसक्तिवश तिल पीसता है, वह स्वयं रौरव नरक में जाता है।
 
श्लोक d33:  युधिष्ठिर! चंद्रमा गन्ने के वंश में उत्पन्न हुए हैं और ब्राह्मण चंद्रमा के वंश में उत्पन्न होते हैं। इसलिए ब्राह्मण को चक्की में गन्ना नहीं पीसना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)