श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 105: धर्म और शौचके लक्षण, संन्यासी और अतिथिके सत्कारके उपदेश, शिष्टाचार, दानपात्र ब्राह्मण तथा अन्न-दानकी प्रशंसा  »  श्लोक d4
 
 
श्लोक  14.105.d4 
बाल्ये विद्यां निषेवेत यौवने दारसंग्रहम्।
वार्धके मौनमातिष्ठेत् सर्वदा धर्ममाचरेत् ॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को चाहिए कि बचपन में विद्याध्ययन करे, युवावस्था में विवाह करे, वृद्धावस्था में संन्यासी का जीवन अपनाए तथा सभी परिस्थितियों में सदैव धर्म के मार्ग पर चले।
 
A man should study in childhood, marry a woman when he attains youth, take up the life of a monk in old age and always follow the path of religion in all situations.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)