श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 105: धर्म और शौचके लक्षण, संन्यासी और अतिथिके सत्कारके उपदेश, शिष्टाचार, दानपात्र ब्राह्मण तथा अन्न-दानकी प्रशंसा  »  श्लोक d33
 
 
श्लोक  14.105.d33 
आदत्ते हि रसं सर्वमादित्य: स्वगभस्तिभि:।
वायुस्तस्मात् समादाय रसं मेघेषु धारयेत्॥
 
 
अनुवाद
सूर्य अपनी किरणों से पृथ्वी का सारा रस खींच लेता है और पवन उसे ले जाकर बादलों में डाल देता है।
 
The Sun draws out all the juice from the Earth with its rays and the wind takes it and places it in the clouds.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)