श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 105: धर्म और शौचके लक्षण, संन्यासी और अतिथिके सत्कारके उपदेश, शिष्टाचार, दानपात्र ब्राह्मण तथा अन्न-दानकी प्रशंसा  »  श्लोक d20
 
 
श्लोक  14.105.d20 
युधिष्ठिर उवाच
धर्माधर्मविधिस्त्वेवं भीष्मेण सम्प्रभाषितम्।
भीष्मवाक्यात् सारभूतं वद धर्मं सुरेश्वर॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, 'हे प्रभु! भीष्मजी ने धर्म और अधर्म का यह विधान विस्तार से बताया है। कृपया उनके वचनों से मुझे धर्म का सार बताइए।'
 
Yudhishthira said, 'O Lord! Bhishmaji had described this method of Dharma and Adharma in detail. Please tell me the essence of Dharma from his words.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)