श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 105: धर्म और शौचके लक्षण, संन्यासी और अतिथिके सत्कारके उपदेश, शिष्टाचार, दानपात्र ब्राह्मण तथा अन्न-दानकी प्रशंसा  »  श्लोक d2
 
 
श्लोक  14.105.d2 
श्रीभगवानुवाच
शृणु राजन् समासेन धर्मशौचविधिक्रमम्।
अहिंसा शौचमक्रोधमानृशंस्यं दम: शम:।
आर्जवं चैव राजेन्द्र निश्चितं धर्मलक्षणम्॥
 
 
अनुवाद
श्री भगवान बोले - राजन! तुम संक्षेप में धर्म का क्रम और शौच की विधि सुनो। राजेन्द्र! अहिंसा, संयम, क्रोध का अभाव, क्रूरता का अभाव, साहस, शील और सरलता - ये धर्म के निश्चित लक्षण हैं।
 
Shri Bhagavan said – King! You listen briefly to the order of religion and the method of toilet. Rajendra! Non-violence, abstinence, absence of anger, absence of cruelty, courage, modesty and simplicity – these are the definite characteristics of religion.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)