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mahabharat 14.104.d9: जो दरिद्र मनुष्य अपने पास प्राप्त थोड़ी सी वस्तुओं को ही अपना सर्वस्व समझता है और उनके नष्ट हो जाने से जिसकी दशा दयनीय हो जाती है, ऐसे मनुष्य से जो मनुष्य सब कुछ छीन लेता है, वह भी ब्रह्महत्यारा कहा गया है।   |   mahabharat अध्याय 14.104: ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 104: ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन  »  श्लोक d9
 
 
श्लोक  14.104.d9 
यावत्सारो भवेद् दीनस्तन्नाशे यस्य दु:स्थिति:।
तत् सर्वस्वं हरेद् यो वै तमाहुर्ब्रह्मघातकम्॥
 
 
अनुवाद
जो दरिद्र मनुष्य अपने पास प्राप्त थोड़ी सी वस्तुओं को ही अपना सर्वस्व समझता है और उनके नष्ट हो जाने से जिसकी दशा दयनीय हो जाती है, ऐसे मनुष्य से जो मनुष्य सब कुछ छीन लेता है, वह भी ब्रह्महत्यारा कहा गया है।
 
A poor man who considers the few things he has acquired as his all and everything, and whose plight becomes miserable due to their loss, the person who snatches away everything from such a man is also called a killer of Brahman.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)