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mahabharat 14.104.d4: जो व्यक्ति क्रोध में आकर किसी आश्रम, घर, गांव या नगर में आग लगाता है, उसे भी ब्रह्महत्या (ब्रह्महत्या) कहा जाता है।   |   mahabharat अध्याय 14.104: ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 104: ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन  »  श्लोक d4
 
 
श्लोक  14.104.d4 
आश्रमे वाऽऽलये वापि ग्रामे वा नगरेऽपि वा।
अग्निं य: प्रक्षिपेत् क्रुद्धस्तमाहुर्ब्रह्मघातकम्॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति क्रोध में आकर किसी आश्रम, घर, गांव या नगर में आग लगाता है, उसे भी ब्रह्महत्या (ब्रह्महत्या) कहा जाता है।
 
One who in anger sets fire to any ashram, house, village or town is also called a Brahmahatya (killer of Brahman).
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)