श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 104: ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन  »  श्लोक d32-d33
 
 
श्लोक  14.104.d32-d33 
अनागतानि कार्याणि कर्तुं गणयते मन:।
शारीरकं समुद्दिश्य स्मयते नूनमन्तक:॥
तस्माद् धर्मसहायस्तु धर्मं संचिनुयात् सदा।
धर्मेण हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम्॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य का मन भविष्य के कर्मों की गणना करता है, किन्तु काल उसके नाशवान शरीर पर मुस्कुराता रहता है; अतः धर्म को सहायक मानकर सदैव उसके संचय में संलग्न रहना चाहिए; क्योंकि धर्म की सहायता से ही मनुष्य घोर नरक से पार हो जाता है।
 
Man's mind calculates future actions, but time keeps smiling at his perishable body; Therefore, considering religion as a helper, one should always remain engaged in its accumulation; Because with the help of religion man crosses the treacherous hell.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)