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mahabharat 14.104.d27: जो मनुष्य स्वर्ण, पृथ्वी, गाय, घोड़ा, बकरा, वस्त्र, शय्या और आसन आदि को आदरपूर्वक ग्रहण करता है तथा जो दाता न्यायपूर्वक आदरपूर्वक दान देता है, वे दोनों ही स्वर्ग को जाते हैं; किन्तु जो अन्यायपूर्वक दान-ग्रहण करते हैं, वे दोनों ही नरक में पड़ते हैं।   |   mahabharat अध्याय 14.104: ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 104: ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन  »  श्लोक d27
 
 
श्लोक  14.104.d27 
हिरण्यभूगवाश्वाजवस्त्रशय्यासनादिषु।
योऽर्चित: प्रतिगृह्णाति दद्यादुचितमेव च।
तावुभौ गच्छत: स्वर्गं नरकं च विपर्यये॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य स्वर्ण, पृथ्वी, गाय, घोड़ा, बकरा, वस्त्र, शय्या और आसन आदि को आदरपूर्वक ग्रहण करता है तथा जो दाता न्यायपूर्वक आदरपूर्वक दान देता है, वे दोनों ही स्वर्ग को जाते हैं; किन्तु जो अन्यायपूर्वक दान-ग्रहण करते हैं, वे दोनों ही नरक में पड़ते हैं।
 
One who accepts gold, earth, cow, horse, goat, clothes, bed and seat etc. with respect and the donor who gives charity with respect according to justice, both of them go to heaven; but those who give and take in a wrongful manner, both of them have to fall into hell.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)