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mahabharat 14.104.d26: अन्नदान करने वाला मनुष्य शाश्वत सुख प्राप्त करता है और वेददान करने वाला मनुष्य परमात्मा की समानता प्राप्त करता है। वेददान सभी दानों में श्रेष्ठ है।   |   mahabharat अध्याय 14.104: ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 104: ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन  »  श्लोक d26
 
 
श्लोक  14.104.d26 
धान्यद: शाश्वतं सौख्यं ब्रह्मदो ब्रह्मसाम्यताम्।
सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते॥
 
 
अनुवाद
अन्नदान करने वाला मनुष्य शाश्वत सुख प्राप्त करता है और वेददान करने वाला मनुष्य परमात्मा की समानता प्राप्त करता है। वेददान सभी दानों में श्रेष्ठ है।
 
A person who donates grains attains eternal happiness and a person who donates Vedas attains equality with the Supreme Being. Donation of Vedas is the best among all donations.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)