श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 102: कपिला गौका तथा उसके दानका माहात्म्य और कपिला गौके दस भेद  »  श्लोक d21
 
 
श्लोक  14.102.d21 
दृष्ट्वा तु कपिलां भक्त्या श्रुत्वा हुंकारनि:स्वनम्।
व्यपोहति नर: पापमहोरात्रकृतं नृप॥
 
 
अनुवाद
राजन! भक्तिपूर्वक कपिला गौ का दर्शन करने तथा उसके रंभाने का शब्द सुनने से मनुष्य दिन-रात के पापों का नाश कर देता है।
 
King! By seeing the Kapila cow with devotion and listening to its mooing sound, a person destroys the sins of a day and night.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)