श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 101: पञ्चमहायज्ञ, विधिवत् स्नान और उसके अंगभूत कर्म, भगवान‍् के प्रिय पुष्प तथा भगवद्भक्तोंका वर्णन  »  श्लोक d76-d78
 
 
श्लोक  14.101.d76-d78 
श्रीभगवानुवाच
शृणु पाण्डव तत्सर्वमर्चनाक्रममात्मन:।
स्थण्डिले पद्मकं कृत्वा चाष्टपत्रं सकर्णिकम्॥
अष्टाक्षरविधानेन ह्यथवा द्वादशाक्षरै:।
वैदिकैरथ मन्त्रैश्च मम सूक्तेन वा पुन:॥
स्थापितं मां ततस्तस्मिन्नर्चयित्वा विचक्षण:।
पुरुषं च तत: सत्यमच्युतं च युधिष्ठिर॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्री ने कहा - पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर! मेरी प्रार्थना का सम्पूर्ण अनुष्ठान सुनो। वेदी पर अष्टदल कमल की पंखुड़ियाँ बनाकर उस पर अष्टाक्षर या द्वादशाक्षर मंत्र, वैदिक मंत्रों तथा पुरुषसूक्त का उच्चारण करके मेरी मूर्ति स्थापित करो। फिर बुद्धिमान पुरुष मुझ अच्युत पुरुष के वास्तविक स्वरूप की पूजा करे।
 
Lord Shri said – Yudhishthir, son of Pandu! Listen to all the rituals of my prayer. An octagonal lotus with petals should be made on the altar. Establish my idol on it with the help of Ashtakshar or Dwadshakshar mantra, Vedic mantras and Purushasukta. Then the wise man should worship me, the true form of the infallible man.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)