श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 100: अनेक प्रकारके दानोंकी महिमा  »  श्लोक d22
 
 
श्लोक  14.100.d22 
तत्र शक्रपुरे रम्ये तस्य कल्पकपादप:।
ददाति चेप्सितं सर्वं मनसा यद् यदिच्छति॥
 
 
अनुवाद
वहाँ सुन्दर इन्द्रनगरी में कल्पवृक्ष वह सभी इच्छित वस्तुएँ प्रदान करता है, जिनकी मनुष्य अपने मन में कामना करता है।
 
There in the beautiful Indranagari the Kalpavriksha gives all the desired things that one desires in his mind.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)