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mahabharat 13.99.d98: संन्यासी को जंगली फल, कंद-मूल या सूखे पत्ते खाने चाहिए। उसे भोजन भोग के लिए नहीं, बल्कि शरीर के पोषण के लिए करना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d98
 
 
श्लोक  13.99.d98 
शीर्णपर्णपुटे वापि वन्ये चरति भिक्षुक:।
न भोगार्थमनुप्रेत्य यात्रामात्रं समश्नुते॥
 
 
अनुवाद
संन्यासी को जंगली फल, कंद-मूल या सूखे पत्ते खाने चाहिए। उसे भोजन भोग के लिए नहीं, बल्कि शरीर के पोषण के लिए करना चाहिए।
 
A Sanyasi should eat wild fruits, roots or dry leaves. He should eat food not for enjoyment but for the sustenance of his body.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)