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mahabharat 13.99.d96-d97: संन्यासी को नियमित रूप से तीर्थस्थानों का भ्रमण करना चाहिए, नदियों के किनारे कुटिया बनाकर वहीं रहना चाहिए। या किसी खाली घर में डेरा डालना चाहिए। जंगल में पेड़ों के नीचे या पहाड़ों की गुफाओं में रहना चाहिए। हमेशा जंगल में विचरण करना चाहिए। वेदरूपी वन में आश्रय लेना चाहिए, किसी भी स्थान पर एक-दो रात से ज़्यादा नहीं रुकना चाहिए। किसी भी चीज़ में आसक्ति नहीं रखनी चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d96-d97
 
 
श्लोक  13.99.d96-d97 
पुण्यतीर्थानुसेवी च नदीनां पुलिनाश्रय:।
शून्यागारनिकेतश्च वनवृक्षगुहाशय:॥
अरण्यानुचरो नित्यं वेदारण्यनिकेतन:।
एकरात्रं द्विरात्रं वा न क्वचित् सज्जते द्विज:॥
 
 
अनुवाद
संन्यासी को नियमित रूप से तीर्थस्थानों का भ्रमण करना चाहिए, नदियों के किनारे कुटिया बनाकर वहीं रहना चाहिए। या किसी खाली घर में डेरा डालना चाहिए। जंगल में पेड़ों के नीचे या पहाड़ों की गुफाओं में रहना चाहिए। हमेशा जंगल में विचरण करना चाहिए। वेदरूपी वन में आश्रय लेना चाहिए, किसी भी स्थान पर एक-दो रात से ज़्यादा नहीं रुकना चाहिए। किसी भी चीज़ में आसक्ति नहीं रखनी चाहिए।
 
A Sanyasi should regularly visit holy places, build a hut on the banks of rivers and live there. Or camp in an empty house. Live under trees in the forest or in the caves of mountains. Always roam in the forest. Take shelter in the forest of Vedas, do not stay in any place for more than one or two nights. Do not get attached to anything.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)