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mahabharat 13.99.d93: एक संन्यासी को, चाहे उसे संयोग से कुछ प्राप्त हो या नहीं, जो भी मिले उसका उपयोग अपने जीवन को चलाने तथा अपने शरीर को पोषण देने के लिए करना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d93
 
 
श्लोक  13.99.d93 
लब्धालब्धेन जीवेत तथैव परिपोषयेत्।
 
 
अनुवाद
एक संन्यासी को, चाहे उसे संयोग से कुछ प्राप्त हो या नहीं, जो भी मिले उसका उपयोग अपने जीवन को चलाने तथा अपने शरीर को पोषण देने के लिए करना चाहिए।
 
A Sanyasi should, whether he gets anything by chance or not, use whatever he gets to sustain his life and nourish his body.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)