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mahabharat 13.99.d91: किसी भिक्षु के प्रति कभी कोई अपराध न करें, उसकी उपेक्षा न करें, उसके कठोर शब्दों का उत्तर न दें, तथा यदि वह क्रोधित हो तो उसे प्रसन्न करने का प्रयास करें।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.99.d91 
नापराध्येत भिक्षोस्तु न चैवमवधीरयेत्॥
उत्तरं च न संदद्यात् क्रुद्धं चैव प्रसादयेत्।
 
 
अनुवाद
किसी भिक्षु के प्रति कभी कोई अपराध न करें, उसकी उपेक्षा न करें, उसके कठोर शब्दों का उत्तर न दें, तथा यदि वह क्रोधित हो तो उसे प्रसन्न करने का प्रयास करें।
 
Never commit an offence against a bhikshu, never ignore him, never reply to his harsh words, and if he is angry then try to please him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)