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mahabharat 13.99.d87: शूद्र को चाहिए कि जब तक वह इस शरीर को न छोड़े, तब तक इसी प्रकार सेवा करता रहे। उसे धर्म का उल्लंघन नहीं करना चाहिए तथा साधु-संन्यासियों के प्रति अपमानजनक व्यवहार नहीं करना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d87
 
 
श्लोक  13.99.d87 
आदेहपतनादेवं शुश्रूषेद् विधिपूर्वकम्।
न त्वेव धर्ममुत्सृज्य कुर्यात् तेषां प्रतिक्रियाम्॥
 
 
अनुवाद
शूद्र को चाहिए कि जब तक वह इस शरीर को न छोड़े, तब तक इसी प्रकार सेवा करता रहे। उसे धर्म का उल्लंघन नहीं करना चाहिए तथा साधु-संन्यासियों के प्रति अपमानजनक व्यवहार नहीं करना चाहिए।
 
A Shudra should continue to serve in this manner till he leaves this body. He should not violate Dharma and behave in a derogatory manner towards those Sadhus and Sanyasis.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)