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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d72-d73
 
 
श्लोक  13.99.d72-d73 
तथाऽऽत्मा प्रणिधातव्यो यथा ते प्रीतिमाप्नुयु:।
परिचारिकोऽहं वर्णानां त्रयाणां धर्मत: स्मृत:॥
किमुताश्रमवृद्धानां यथालब्धोपजीविनाम्॥
 
 
अनुवाद
सेवा में इतनी सावधानी से लगना चाहिए कि संत प्रसन्न हों। शूद्र को सदैव यह विचार करना चाहिए कि 'शास्त्रों में मुझे तीनों वर्णों का सेवक कहा गया है।' फिर उन वृद्ध संन्यासियों की सेवा के विषय में क्या कहा जा सकता है जो संन्यास आश्रम में रहते हैं और जो मिलता है उसी से अपना निर्वाह करते हैं? (उनकी सेवा करना मेरा परम कर्तव्य है)।
 
One should engage oneself in service with such care that the saints are pleased. A Shudra should always think that 'I am described as a servant of all three castes in the scriptures. Then what can be said about serving the elderly sannyasis who live in the ashram of sannyas and survive on whatever they get? (Serving them is my ultimate duty).
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)