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mahabharat 13.99.d55-d56: शूद्र को मधुर वचन बोलने चाहिए, क्रोध पर काबू रखना चाहिए, आलस्य को दूर भगाना चाहिए, ईर्ष्या और द्वेष से मुक्त होना चाहिए, क्षमाशील, विनम्र और सत्य धर्म का पालन करने में तत्पर होना चाहिए। संकट के समय उसे साधुओं के आश्रम में जाकर उनकी सेवा करनी चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d55-d56
 
 
श्लोक  13.99.d55-d56 
प्रियवादी जितक्रोधो वीततन्द्रिरमत्सर:।
क्षमावान् शीलसम्पन्न: सत्यधर्मपरायण:॥
आपद्भावेन कुर्याद्धि शुश्रूषां भिक्षुकाश्रमे॥
 
 
अनुवाद
शूद्र को मधुर वचन बोलने चाहिए, क्रोध पर काबू रखना चाहिए, आलस्य को दूर भगाना चाहिए, ईर्ष्या और द्वेष से मुक्त होना चाहिए, क्षमाशील, विनम्र और सत्य धर्म का पालन करने में तत्पर होना चाहिए। संकट के समय उसे साधुओं के आश्रम में जाकर उनकी सेवा करनी चाहिए।
 
A Shudra should speak kind words, overcome anger, drive away laziness, be free from jealousy and hatred, be forgiving, polite and ready to follow the true religion. During the crisis, he should go to the ashram of the monks and serve them.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)