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mahabharat 13.99.d53-d54: मनुष्य इस संसार में जो भी कल्याणकारी कार्य करता है, उसका फल उसे मृत्यु के बाद मिलता है। जो भी कार्य उसे अपना कर्तव्य समझकर करना चाहिए, उसे बिना किसी नकारात्मक सोच के करना चाहिए। नकारात्मक सोच के साथ किए गए कार्य का फल इस संसार में बड़े दुःख के साथ मिलता है।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d53-d54
 
 
श्लोक  13.99.d53-d54 
इह यत् कुरुते श्रेयस्तत् प्रेत्य समुपाश्नुते।
तच्चानसूयता कार्यं कर्तव्यं यद्धि मन्यते॥
असूयता कृतस्येह फलं दु:खादवाप्यते॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य इस संसार में जो भी कल्याणकारी कार्य करता है, उसका फल उसे मृत्यु के बाद मिलता है। जो भी कार्य उसे अपना कर्तव्य समझकर करना चाहिए, उसे बिना किसी नकारात्मक सोच के करना चाहिए। नकारात्मक सोच के साथ किए गए कार्य का फल इस संसार में बड़े दुःख के साथ मिलता है।
 
Whatever welfare work a man does in this world, he gets its fruits after his death. Whatever he considers his duty, he should do that work without any negative thinking. The work done with negative thinking, its result is received with great sorrow in this world.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)