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mahabharat 13.99.d48-d49: त्रिवर्ण की सेवा में असमर्थ हो जाने वाले शूद्रों को अपने बल, बुद्धि, धर्म और शास्त्र ज्ञान के अनुसार आश्रमवासियों की सेवा करनी चाहिए। विशेषकर संन्यास आश्रम में रहने वाले साधु की सेवा करना उसके लिए परम कर्तव्य है।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d48-d49
 
 
श्लोक  13.99.d48-d49 
अशक्तेन त्रिवर्णस्य सेव्या ह्याश्रमवासिन:।
यथाशक्ति यथाप्रज्ञं यथाधर्मं यथाश्रुतम्॥
विशेषेणैव कर्तव्या शुश्रूषा भिक्षुकाश्रमे॥
 
 
अनुवाद
त्रिवर्ण की सेवा में असमर्थ हो जाने वाले शूद्रों को अपने बल, बुद्धि, धर्म और शास्त्र ज्ञान के अनुसार आश्रमवासियों की सेवा करनी चाहिए। विशेषकर संन्यास आश्रम में रहने वाले साधु की सेवा करना उसके लिए परम कर्तव्य है।
 
Shudras who become disabled in the service of Trivarna should serve the people of the ashram according to their strength, intelligence, religion and knowledge of scriptures. Especially serving a monk living in a sannyasa ashram is the ultimate duty for him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)