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mahabharat 13.99.d37: ब्राह्मण मुख धोने के बाद अपनी अंगुलियों से अपनी आंखों को स्पर्श करके सूर्यदेव को, नाक को स्पर्श करके वायु को तथा कानों को स्पर्श करके दिशाओं को संतुष्ट करता है।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d37
 
 
श्लोक  13.99.d37 
यच्चक्षुषि समाधत्ते तेनादित्यं तु प्रीणयेत्॥
प्रीणाति वायुं घ्राणं च दिशश्चाप्यथ श्रोत्रयो:।
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण मुख धोने के बाद अपनी अंगुलियों से अपनी आंखों को स्पर्श करके सूर्यदेव को, नाक को स्पर्श करके वायु को तथा कानों को स्पर्श करके दिशाओं को संतुष्ट करता है।
 
After washing the face, the Brahmin satisfies the Sun God by touching his eyes with his fingers. He satisfies the wind by touching his nose and the directions by touching his ears.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)