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mahabharat 13.99.d32: इस विधि से आलस्य त्यागकर प्रतिदिन शुद्धि करनी चाहिए तथा शुद्धि करने वाले को दोनों पैर धोकर इधर-उधर देखे बिना घबराए हुए चले जाना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d32
 
 
श्लोक  13.99.d32 
विधिनानेन शौचं तु नित्यं कुर्यादतन्द्रित:॥
अविप्रेक्षन्नसम्भ्रान्त: पादौ प्रक्षाल्य तत्पर:।
 
 
अनुवाद
इस विधि से आलस्य त्यागकर प्रतिदिन शुद्धि करनी चाहिए तथा शुद्धि करने वाले को दोनों पैर धोकर इधर-उधर देखे बिना घबराए हुए चले जाना चाहिए।
 
By this method, one should give up laziness and perform the purification (purification) every day and the person performing the purification should wash both the feet and go without any nervousness without looking here and there.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)