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mahabharat 13.99.d133: जो मनुष्य शुद्ध तत्त्वार्थ को उसके सार से जानता है, वह अखण्ड ब्रह्म हो जाता है।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d133
 
 
श्लोक  13.99.d133 
निष्कलं केवलं भवति शुद्धतत्त्वार्थतत्त्ववित्॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य शुद्ध तत्त्वार्थ को उसके सार से जानता है, वह अखण्ड ब्रह्म हो जाता है।
 
The man who knows the pure Tattvartha from its essence becomes a unique Brahma without any component.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)