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mahabharat 13.99.d112: ऋषिगण जिस परम लक्ष्य की खोज करते हैं, उसका दर्शन शास्त्रों में होता है। वहाँ पहुँचकर मनुष्य शाश्वत दुःखों का परित्याग कर अमरत्व प्राप्त कर लेता है।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d112
 
 
श्लोक  13.99.d112 
परा चैषा गतिर्दृष्टा यामन्वेषन्ति साधव:॥
यत्रामृतत्वं लभते त्यक्त्वा दु:खमनन्तकम्।
 
 
अनुवाद
ऋषिगण जिस परम लक्ष्य की खोज करते हैं, उसका दर्शन शास्त्रों में होता है। वहाँ पहुँचकर मनुष्य शाश्वत दुःखों का परित्याग कर अमरत्व प्राप्त कर लेता है।
 
The ultimate goal which the sages search for is seen in the scriptures. Reaching there, man gives up eternal sorrow and attains immortality.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)